Saturday, October 31, 2009
कुत्ता, शेर और बन्दर
तरफ़ आ रहा है। कुत्ते की साँस रूक गयी। "आज तो काम तमाम मेरा!"
उसने सोचा. फिर उसने सामने कुछ सूखी हड्डियाँ पड़ी देखी। वो आते हुए
शेर की तरफ़ पीठ कर के बैठ गया और एक सूखी हडी को चूसने लगा
और ज़ोर ज़ोर से बोलने लगा, "वह! शेर को खाने का मज़ा ही कुछ और है .एकऔर मिल जाए तो पूरी दावत हो जायेगी!"
और उसने जोर से डकार मारी.इस बार शेर सोच में पड़ गया. उसने सोचा "ये कुत्ता तो शेर का शिकार करता है! जान बचा कर भागो!"
और शेर वहां से जान बचा के भागा .
पेड़ पर बैठा एक बन्दर यह सब तमाशा देख रहा था . उसने सोचा यह मौका
अच्छा है शेर को सारी कहानी बता देता हूँ - शेर से दोस्ती हो जायेगी और
उससे ज़िन्दगी भर के लिए जान का खतरा दूर हो जाएगा.. वोह फटाफट शेर
के पीछे भागा. कुत्ते ने बन्दर को जाते हुए देख लिया और समझ गया कि
कोई लोचा है. उधर बन्दर ने शेर को सब बता दिया कि कैसे कुत्ते ने उसे
बेवकूफ बनाया है. शेर ज़ोर से दहाडा, "चल मेरे साथ अभी उसकी लीला
ख़तम करता हूँ " और बन्दर को अपनी पीठ पर बैठा कर शेर कुत्ते कि
तरफ़ लपका।
कैन उ अमेजिने दा क्विक मैनेजमेंट बी दा डॉग...
-
-
-
-
-
-
-
-
-
-
-
-
-
-
कुत्ते ने शेर को आते देखा तो एक बार फिर उसकी तरफ़ पीठ करके बैठ
गया और ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगा , "इस बन्दर को भेज के १ घंटा हो गया,
साला एक शेर फसा कर नही ला सकता!"
Tuesday, September 22, 2009
हर खुशी है लोगों के दामन मे
हर खुशी है लोगों के दामन मे,
पर एक हँसी के लिए वक्त नही ।दिन रात दौड़ती दुनिया मे,जिंदगी के लिए ही वक्त नही. माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक्त नही.सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक्त नही. सारे नाम मोबाइल मे हैं,
पर दोस्ती के लिए वक्त नही.
गैरों की क्या बात करें,जब अपनों के लिए ही वक्त नही.
आंखों में है नींद बड़ी,पर सोने का वक्त नही.
दिल है ग़मों से भरा हुआ,पर रोने का भी वक्त नही . ( 100% fact) पैसों की दौड़ में ऐसे दौडे,की थकने का भी वक्त नही.
पराये एहसासों की क्या कद्र करें,
जब अपने सपनो के लिए ही वक्त नही.
तू ही बता ऐ जिंदगी,इस जिंदगी का क्या होगा,की हर पल मरने वालों को,जीने के लिए भी वक्त नही.........
आसमा लाख ऊंचा ही मगर झुक जाता है
दोस्ती में दुनिया लाख बने रूकावट
अगर दोस्त सच्चा तो खुदा भी झुक जाता है.
दोस्ती वो एहसास है जो मिटता नहीं
दोस्ती वो पर्वत है जो झुकता नहीं
इसकी कीमत क्या पूछो हमसे
ये वो अनमोल मोती है जो बिकता नहीं
सच्ची है दोस्ती आजमा के देखो
करके यकीन मुझपे मेरे पास आके देखो
बदलता नहीं कभी सोना अपना रंग कभी
चाहे जितनी बार आग में जला कर के देखो
दर्द जितना सहा जाये उतना ही सहना
दिल जो लग जाये वो बात न कहना
मिलते है हमारे जैसे दोस्त बहुत कम इसलिये
कभी न GOOD BYE मत कहना दोस्ती सच्ची हो तो वक़्त रूक जाता है
आसमा लाख ऊंचा ही मगर झुक जाता है
दोस्ती में दुनिया लाख बने रूकावट
अगर दोस्त सच्चा तो खुदा भी झुक जाता है.
तुम दाल-दाल, हम घास-पात।
एक मध्यवगीर्य परिवार में रिश्ते की बात चल रही है। लड़के वाले इस बात पर जोर दे रहे हैं कि बारातियों की खातिरदारी अच्छी होनी चाहिए। खाने में दाल जरूर होनी चाहिए। जब लड़के के पिता ने यह बात तीसरी बार कही तो लड़की का पिता चुप न रह सका, 'समधी जी, हम अपनी ओर से कोई कसर नहीं रखेंगे। लेकिन एक बात आपको तय करनी है, आपको दहेज चाहिए या दाल?'
मेरे जैसे लोग, जिन्हें मुफ्त की पार्टियों में जाने का अच्छा अनुभव है, जानते हैं कि बुफे में सबसे लंबी लाइन चिकन के डोंगे के आगे लगती है। पांच के बाद छठे आदमी के लिए एक टुकड़ा भी नहीं बचता। अब यही हाल दाल का होने वाला है। सेठ जी के घर में खाना बनाने वाली महाराजिन दाल भिगो रही थी। उसने देखा किसी का ध्यान नहीं है तो चुपके से दाल का कुछ दाना उठा कर अपनी चुन्नी में बांध लिया। लेकिन सेठानी की नजर से यह बात छिपी न रही। सेठ लोग ऐसे ही सेठ नहीं बन जाते। चोरी पकड़ी गई तो नौकरानी गिड़गिड़ाने लगी, 'मेरा बेटा बहुत छोटा है। बार-बार पूछता है, दाल कैसी होती है? सोचा ले जाकर ये दाने दिखा दूंगी। खा नहीं सकता, पर देख तो ले।' सेठानी दयालु थीं, बोलीं, 'ठीक है। आज तो छोड़ देती हूं। अगली बार ऐसा नहीं होना चाहिए।'
एक समय, एक कहावत बनाई गई थी- भूखे भजन न होय गोपाला। उसके जवाब में कहा गया- दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुन गाओ। 'भूखे भजन न होय गोपाला' वाली कहावत आज भी इस्तेमाल की जाती है। लेकिन कोई 'दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुन गाओ' नहीं कहता। भक्त लोग भड़क जाते हैं।
सुबह-सुबह पत्नी बोली, 'दाल खत्म हो गई है।' मैं तब तक नहाया नहीं था। रात को जो कपड़े पहन कर सोया था, वही मुड़े हुए कपड़े पहन कर किराने की दुकान पर चला गया। अरहर की दाल की ओर इशारा करके पूछा, 'ये क्या भाव है?' दुकानदार ने मेरे कपड़ों पर नजर डाली और बोला, 'बोहनी के वक्त मूड मत खराब कर। जो लेना है उसका भाव पूछो।' फिर वह अपने नौकर पर चिल्लाया, 'कितनी बार बोला, दाल यहां एकदम सामने मत रख! लोग बेकार में भाव पूछ कर टाइम खराब करते हैं।'
समय बदलता है। हालात बदलते हैं। भाषा भी बदलती है। साधारण स्थिति का दामाद, अपनी साधारण स्थिति की ससुराल में पहुंचा। सास ने पूछा, 'कुंवर जी क्या खाओगे?' दामाद बोला, 'दाल।' सास ने पूछा, 'दाल?' 'हां, कोई भी दाल।' तब साली से नहीं रहा गया, 'जीजाजी, ज़रा आईने में शक्ल देख ली होती - ये मुंह और कोई भी दाल!' आजकल मूंग भी मसूर से कम महत्वपूर्ण नहीं है। जो कहावत कभी चतुराई का प्रतीक हुआ करती थी, आजकल वह समाज में आपके स्टेटस का प्रतीक बन गई है। पहले लोग कहते थे - तुम डाल-डाल, हम पात-पात। आजकल कहते हैं - तुम दाल-दाल, हम घास-पात।
आज हर गरीब के घर में यह यक्ष प्रश्न गूंज रहा है - दाल कैसी होती है? मजदूर की बीवी ने बेटे के सामने अल्यूमिनियम की मुड़ी- तुड़ी थाली रख दी। बेटे ने रोटी का एक कौर तोड़ कर मुंह में डाला और पूछा, 'अम्मा, यह दाल क्या होती है?' मां तुरंत टोकते हुए बोली, 'बेटा, धीरे बोल। कहीं बाजार सुन न ले। वरना वह जान जाएगा कि हम लोग एक वक्त रोटी खा लेते हैं।'
Thursday, September 10, 2009
हमे कायर कहते है
दर्द ना बताओ तो हमे कायर कहते है, और दर्द बताओ तो हमे शायर कहते है !!
Tuesday, September 8, 2009
दोस्ती हर रिश्ते से लाजवाब होती है
वक्त मिले तो रिश्तो की किताब पढ़ लेना, दोस्ती हर रिश्ते से लाजवाब होती है !!
Sunday, September 6, 2009
सपने बो नही होते
सपने बो होते है, जो मनुष्य को सोने नही देते हैं !!
कुछ दिल के उदगार
देश की हालत बिगड़ गई, ऋषियो की फुलबादी थी बह सारी उजड़ गई !
फूट घर - घर मैं है आई, चुनाव की प्रडाली ने तो है आग लगाई !
मूर्ख बह नेता बन जाते, मन मानी कानून देश को लूट लूट खाते !
वोट गुंडों के अधिक पड़े, राजनीति के ग्याता रह गए हाथ पे धरे !
धरम बिन राजनीति अंधी, राजनीति बिन धरम है लंगडा मति हो गई मंदी !
बनाये पागल मत दाता , बिना सुनाये मेरे से अब ...............................
Saturday, September 5, 2009
पंख से कुछ नही होता
मंजिलें उन्ही को मिलती हैं, जिनके सपनों मे जान होती है !!
सत्य बचन
कुछ समय ऐसा निकालो, प्रेम करलो राम से !!